कथा · मूल देवनागरी पाठ

सोमवार व्रत कथा

Somvar Vrat Katha

लोक परंपरा

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01शीर्षक

कथा

02पद

एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, पर संतान न होने से वह और उसकी पत्नी दुखी रहते थे। साहूकार हर सोमवार श्रद्धा से व्रत रखता और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करता था।

03पद

उसकी भक्ति देखकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा — "प्रभु, यह साहूकार आपका सच्चा भक्त है, इसकी इच्छा पूरी कीजिए।" शिव जी बोले — "हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है। इसके भाग्य में पुत्र नहीं है।" पार्वती जी के बहुत आग्रह करने पर शिव जी ने वरदान दिया कि साहूकार को पुत्र होगा, पर उसकी आयु केवल बारह वर्ष की होगी।

04पद

साहूकार ने यह बात सुनी, पर वह न अधिक प्रसन्न हुआ न दुखी। वह पहले की तरह सोमवार का व्रत और पूजा करता रहा। कुछ समय बाद उसके घर सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।

05पद

जब बालक ग्यारह वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे पढ़ने के लिए उसके मामा के साथ काशी भेजा और कहा — "रास्ते में जहाँ ठहरो, वहाँ यज्ञ करना और ब्राह्मणों को भोजन व दान देना।" मामा-भांजे ऐसा ही करते हुए आगे बढ़े।

06पद

रास्ते में एक नगर में राजकुमारी का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से विवाह होना था, वह एक आँख से काना था। उसके पिता ने यह बात छिपाने के लिए साहूकार के सुंदर पुत्र को दूल्हा बनाकर विवाह करवा दिया। ईमानदार बालक ने विदा से पहले राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया — "तुम्हारा विवाह मुझसे हुआ है। जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आँख से काना है। मैं पढ़ने काशी जा रहा हूँ।"

07पद

राजकुमारी ने चुनरी पर लिखी बात पढ़ी और काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया। बारात खाली लौट गई। उधर मामा-भांजा काशी पहुँचकर पढ़ाई और यज्ञ करने लगे।

08पद

जिस दिन बालक बारह वर्ष का हुआ, उस दिन यज्ञ के समय उसकी तबीयत बिगड़ी और वह भीतर जाकर लेट गया। कुछ ही देर में उसके प्राण निकल गए। मामा विलाप करने लगे।

09पद

उसी समय शिव-पार्वती वहाँ से गुज़र रहे थे। विलाप सुनकर पार्वती जी ने कहा — "प्रभु, यह तो उसी साहूकार का पुत्र है। इसे जीवन दीजिए।" शिव जी ने कहा कि इसकी आयु पूरी हो चुकी है, पर पार्वती जी के आग्रह और साहूकार की भक्ति के कारण उन्होंने बालक को फिर से जीवित कर दिया।

10पद

पढ़ाई पूरी करके मामा-भांजा घर लौटे। रास्ते में उसी नगर में राजा ने बालक को पहचान लिया और बड़े सम्मान व धन-दौलत के साथ राजकुमारी को उसके साथ विदा कर दिया।

11पद

इधर साहूकार और उसकी पत्नी ने प्रण किया था कि यदि पुत्र न लौटा तो वे भी प्राण त्याग देंगे। उसी रात शिव जी ने साहूकार को सपने में दर्शन देकर कहा — "तुम्हारे सोमवार व्रत और कथा सुनने से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को लंबी आयु दी है।" अगले दिन पुत्र और बहू को देखकर घर में आनंद छा गया।

12शीर्षक

फल

13पद

जो भक्त श्रद्धा से सोमवार का व्रत रखता है और यह कथा पढ़ता या सुनता है, भगवान शिव उसके सब दुख दूर करते हैं और मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। बोलो उमापति महादेव की जय!

आप जहाँ चाहें, वहीं रुक सकते हैं।

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